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दूरदर्शन पर डा.भगवतीशरण मिश्र की पुस्तक पर चर्चा

नई दिल्ली। दूरदर्शन के व्यास चैनल पर माह के अंतिम दिन होने वाली पुस्तक चर्चा में इस बार पूर्व आई.ई.एस. एवं प्रख्यात उपन्यासकार डॉ. भगवती शरण मिश्र के सम्पूर्ण व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर हाल ही में प्रकाशित ग्रन्थ पर केन्द्रित रही। सुश्री रूबी साहित्यरत्न द्वारा लिखित ‘एक उपन्यासकार डॉ. भगवती शरण मिश्र की जीवनगाथा’ पर इस शैक्षिक चैनल द्वारा आयोजित चर्चा में वरिष्ठ  साहित्यकार डॉ.भगवती शरण  मिश्र भी उपस्थित थे। संयोजक श्री अमरेन्दर कुमार  ने चर्चा का शुभारभ करते हुए डॉ. मिश्र के व्यक्तित्व व कृतित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। उनके अनुसार ‘डा. मिश्र के साहित्य में भारतीय संस्कृति का सुंदर चित्रण हमें अहसास करवाता है कि भूतकाल का अध्ययन वर्तमान को बेहतर बनाता है तो वर्तमान की समीक्षा भविष्य को श्रेष्ठ बना सकती है। 
एक सवाल के जवाब में डॉ.मिश्र अपने पितामह पं. यजुनन्दन मिश्र जोकि संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे, की प्रेरणा को अपने समस्त साहित्यिक उपलब्धियों का श्रेय देते हुए यह रहस्योद्घाटन भी किया कि उनके पिता पं. गजानन मिश्र उनके लेखन कर्म से खिन्न रहते थे क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि अन्य लेखकों की तरह उनके पुत्र का जीवन भी अभावग्रस्त हो। इसीलिए उन्होंने बाल्यकाल में लिखे उनके उपन्यास ‘भीगी पलकें’ को फाड़ दिया और लेखन से दूर रहने की चेतावनी भी दी।
चर्चा में मुख्य वक्ता के रूप में भाग लेने वाले राष्ट्र-किंकर संपादक डा. विनोद बब्बर ने डॉ. भगवती शरण मिश्र के सम्पूर्ण साहित्य को उदात्त जीवन मूल्यों को समर्पित, उद्देश्य परक और  कालजयी बताया। डॉ.मिश्र द्वारा पौराणिक पृष्ठभूमि पर लिखे दर्जनों उपन्यास वर्तमान पीढ़ी को युगबोध करवाते हैं इसी कारण अनेक भारतीय भाषाओं में उनके अनुवाद भी हुए। एकला चलो रे, लक्ष्मण रेखा, एक और अहल्या, मैं भीष्म बोल रहा हूँ, अथ मुख्यमंत्री कथा, देख कबीरा रोया, काके लागू पाय, मैं राम बोल रहा हूँ आदि उपन्यासों को उदृत करते हुए विनोद बब्बर ने दार्शनिक संवादों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। प्रेम को मर्यादा का पर्याय बताना, देश और दुनिया में सूर्यास्त को निहारने वालों की भीड़ लेकिन सूर्याेदय के समय बिस्तर न छोड़ना अर्थात दूसरों के पतन से आनंदित होने की मानवीय प्रवृति, अपने से भागने और अपनों से भागने जैसे दार्शनिक संवादों की व्याख्या करते उन्होंने डा. मिश्र को साहित्य क्षितिज का दिनकर घोषित किया जो अर्थशास्त्र से पीएचडी करते है लेकिन रहे भाषा और संस्कृति की अर्थ(धरती)से जुडें हुए। साहित्य को समाज का दर्पण बताने की चर्चा करते हुए साहित्यकार सेे कमेन्टेटर नहीं युगदृष्टा होने की अपेक्षा की जिसे युद्ध भूमि से धृत राष्ट्र  को  आंखों देखा हाल सुनाने वाला संजय नहीं, अर्जुन का संशय दूर करने वाले श्रीकृष्ण होना चाहिए। 
मासिक पत्रिका ‘दूसरा मत’ के संपादक श्री ए.आर.आजाद ने डा.मिश्र के व्यक्तित्व और उनकी कृतियों के चरित्र में एकरूपता, उनकी समृद्ध भाषा, मानवीय मूल्यों के प्रति विशेष आग्रह, सच्चा मानवतावादी  होने  के अतिरिक्त उनकी कहानियों की विशेष चर्चा की। डा. अम्बरीश कुमार द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते हुए डा.मिश्र ने श्री अमृतलाल नागर से स्वयं की तुलना को सचोच्च सम्मान बताया क्योंकि नागर जी उनके प्रिय रचनाकर रहे है।

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